Wednesday, December 31, 2014

वास्तविक मुद्दे से भटकती भारत की राजनीतिक पार्टियां

ऐसा माना जाता है कि भारत अनेकताओं का देश हैं, लेकिन शायद यह बिखरने के कगार पर पहुंचते जा रहा है। यहां राजनीतिक फायदा के लिए धर्म के ठेकेदारों के द्वारा समाज में तमाम तरह का नया बवाल खड़ा किया जाता रहा है। ऐसा लगता है कि वोट बैंक बनाने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाना इनकी नियति बन चुकी है। पहले राजनितिक वंशवाद के मुद्दे पर जमकर बवाल काटा गया, लेकिन समय बदलते हीं ये मुद्दे गायब हो गए और आजकल जाति, धर्म, क्षेत्र जैसे विषयों को मुद्दा बनाकर सत्ता का लाभ उठाने की कोशिश की जा रही है।


कुछ नेताओं के बयानबाजी से ऐसा लगता है मानो वो अपने आप को विश्व विख्यात बनाना चाह रहे हैं। समाज में विकास की अवधारणा का मुद्दा खो सा गया है। भारत में बढ़ती गरीबी जैसे कई ऐसे अनेक मुद्दों को चुनावी एजेंड़ा में शामिल किया जा सकता है। जिससे देश के विकास को गति मिल सकती है, लेकिन नहीं इन मुद्दों को शामिल न कर एक दूसरे की बुराई, घृणा फैलाना नेताओं के लिए आम बन चुका है। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसकी भावनाएं आहत हो रही हैं। जबकि इसमें आम जनता को पीसना न्यायोचित नहीं लगता है।


अखबारों की सुर्खियां बनने के लिए उलूल-जूलूल बयान देना ऊचित नहीं है। ये देश की एकता और अखंडता में बाधित साबित होते हैं। आरोप- प्रत्यारोप लगाने की आड़ में पार्टियां एक दूसरे की निजी जिंदगी में दखलअंदाजी से भी नहीं चूक रही हैं। यह इस देश के राजनीति के लिए उचित नहीं है। राजनीति में बयानबाजी का एक दायरा बनाना बहुत ही जरूरी है। इसे नजरअंदाज करना देश के आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।


सियासत के दांव-पेंच में पार्टियां ये भूल गई हैं कि राजनीतिक मुद्दों की क्या अहमियत है। हालांकि ये हाल एक अनपढ़ व्यक्ति की नहीं है। पढ़े- लिखे लोगों के गंदे बयान से लोगों को शर्मशार होना पड़ रहा है। नेताओं को पार्टी हितों की ही सिर्फ फिक्र है। समाज और देश हित में कोई बयान देना उन्हें शायद अच्छा नहीं लग रहा है।


अगर भारत में दो पार्टियों के चुनावी ऐजेंडा पर गौर किया जाए तो शायद किसी का एजेंड़ा ऐसा नहीं होता जिससे देश के गरीबों को फायदा हो। वो सिर्फ धर्म और संप्रदाय को ध्यान में रखते हुए बनाए जा रहे हैं। अगर भाजपा हिंदुत्व को मुद्दा बनाती है तो वहीं कांग्रेस अपने को सेक्यूलर पार्टी के रूप में साबित करना चाहती है। ये बहुत हीं सोचने वाला विषय है कि आखिर भारत जैसे विकासशील देश में सबसे अधिक किस मुद्दे की जरूरत है। आखिर धर्म और संप्रदाय से देश में निवास कर रहे गरीबों का इससे कोई भला नहीं होने वाला है। अगर देश के लोगों को जाति, धर्म और संप्रदाय के आधार पर बांट दिया जाए तो क्या इससे देश का विकास संभव है ? कतई नहीं।

भारत युवाओं का देश माना जाता है। अगर इस तरह की राजनीति होती रही तो देश में कई तरह के बवाल खड़े होंगे, जो देश के लिए घातक परिणाम पैदा कर सकते हैं। जो सही मुद्दे हैं उन पर ध्यान देने की जरूरत है न कि बेकार के मुद्दे जिनसे देश गर्त की ओर जा सकता है। राजनीतिक पार्टियों को सही मुद्दों को रखकर चुनाव लड़ने की जरूरत है।

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