ऊँघती हुई परछाईं से डर लगता है,
वक्त की अंगड़ाई से डर लगता है
राह
में न जाने कितनें हैं काँटे,
अब
तो फूलों की रुसवाई से डर लगता है
गैर तो गैर हीं सही,
अब तो अपनें और पराये के साये से डर लगता है
मौसम तो बेवक्त बदलते रहते हैं
अब
तो बिन बादल बरसात से डर लगता है ,
माना बेवफाई बहुत दर्द देती है हमें
अब तो प्यार और दोस्ती के खाईं से डर लगता है
दिल में प्यार बहुत है अपनों के लिए,
अब तो
रिश्तों के गहराई से डर लगता है !!!!
“ अमिताभ गुंजन ”



