Saturday, January 24, 2015

आत्महत्या को विवश अन्नदाता

भारत गांवों का देश  है, यह कहना बहुत हीं आसान लगता है, लेकिन इसको सार्थक बनाना उतना ही मुश्किल कार्य है। भारतीय अर्थव्यवस्था पुरी तरह से कृषि पर निर्भर है। वहीं इसको मेहनत कर फसल को उगाने वाले आत्महत्या करने को विवश हैं, जो बहुत ही गंभीर विषय है। किसानों के लिए बना हर नियम कठिन हैं। ऊपजाऊ भूमि पर सरकार द्वारा अधिग्रहण कर औद्योगिक स्वरूप प्रदान किया जाने लगा है। जमीन अधिग्रहण की नीति में भी कोई बदलाव नहीं आया। कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण बहुत आसानी से किया जा सकता है। जमीन का अधिग्रहण कर किसानों को औने-पौने दामों दे दिया जाता है।


किसानों ने कृषि कार्य करने में हो रहे समस्याओं से अपना नाता तोड़ लिया है ऐसा लगता है मानों उनका कृषि कार्यों से मोहभंग हो गया है। कृषिगत कार्यों में खाद, बीज, सिंचाई जैसी समस्याएं आने के कारण किसान त्रस्त हो गया है। फसलों के नुकसान के बाद मुआवजे की राशि मिलने भी उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं खेती करने के लिए सरकार तमाम तरह के योजनाओं को चलाती है, लेकिन किसानों को ऋण की उपलब्धता में भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।


किसानों के लिए सरकार के द्वारा कुछ खास नीति बनाने की जरूरत है, ताकि उन्हें आसानी से हर संसाधन मुहैया हो सकें। आज का किसान ऋण के बोझ तले दबा हुआ है। जिसके कारण कृषि कार्य को नीचले स्तर कार्य माना जाने लगा है। मशहुर रूरल जर्नलिस्ट पी.साईंनाथ का कहना है किसानों का नाता कृषि से टूट चुका है और वहीं किसान आज शहरों मे मजदूरी करने पर विवश हो गया है।


वैसे तो किसानों के आत्महत्या के कई वजह हैं जिनमें मुख्य वजह बीजों के ऊंचे दाम हैं। इनके आसमान छूते दामों के कारण किसानों को काफी परेशानियां झेलनी पड़ती है। इसके बाद भी किसानों को मौसम पर निर्भर रहना पड़ता है। मौसम खराब होने के कारण किसानों को सरकारी मुआवजे का इंतजार करना पड़ता है, जो किसानों को कर्ज में डूबो देते हैं। इन हालातो में अन्नदाता आत्महत्या को विवश हो जाता है।


कृषि कार्यो में उपकरणों की महंगाई से खेती में मुनाफा बहुत हीं कम मिल पाता है। दिनों दिन खाद ,बीज, मजदूरी में वृद्धि से किसानों का कृषि कार्य से मोहभंग हो गया है। इस कारण वे कृषि कार्य को अपना पेशा बनाना नहीं चाह रहे हैं और कृषि कार्य को छोड़ना चाह रहे हैं। वहीं फसलों का भी सही दाम नहीं मिल पाता है, बिचौलिये काफी पैसे खा जाते हैं, जिससे किसान असंतुष्ट दिखाई देता है।


भारत जैसे कृषि प्रधान देश में कृषि की ये हालात काफी हीं चिंतनीय विषय हैं। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। ऐसे में अन्नदाताओं के आत्महत्या करना बहुत हीं चिंतनीय विषय है। सरकार को औद्योगिकरण से ज्यादा कृषि संबंधित विषयों पर ध्यान देने की जरूरत है।

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Wednesday, December 31, 2014

वास्तविक मुद्दे से भटकती भारत की राजनीतिक पार्टियां

ऐसा माना जाता है कि भारत अनेकताओं का देश हैं, लेकिन शायद यह बिखरने के कगार पर पहुंचते जा रहा है। यहां राजनीतिक फायदा के लिए धर्म के ठेकेदारों के द्वारा समाज में तमाम तरह का नया बवाल खड़ा किया जाता रहा है। ऐसा लगता है कि वोट बैंक बनाने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाना इनकी नियति बन चुकी है। पहले राजनितिक वंशवाद के मुद्दे पर जमकर बवाल काटा गया, लेकिन समय बदलते हीं ये मुद्दे गायब हो गए और आजकल जाति, धर्म, क्षेत्र जैसे विषयों को मुद्दा बनाकर सत्ता का लाभ उठाने की कोशिश की जा रही है।


कुछ नेताओं के बयानबाजी से ऐसा लगता है मानो वो अपने आप को विश्व विख्यात बनाना चाह रहे हैं। समाज में विकास की अवधारणा का मुद्दा खो सा गया है। भारत में बढ़ती गरीबी जैसे कई ऐसे अनेक मुद्दों को चुनावी एजेंड़ा में शामिल किया जा सकता है। जिससे देश के विकास को गति मिल सकती है, लेकिन नहीं इन मुद्दों को शामिल न कर एक दूसरे की बुराई, घृणा फैलाना नेताओं के लिए आम बन चुका है। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसकी भावनाएं आहत हो रही हैं। जबकि इसमें आम जनता को पीसना न्यायोचित नहीं लगता है।


अखबारों की सुर्खियां बनने के लिए उलूल-जूलूल बयान देना ऊचित नहीं है। ये देश की एकता और अखंडता में बाधित साबित होते हैं। आरोप- प्रत्यारोप लगाने की आड़ में पार्टियां एक दूसरे की निजी जिंदगी में दखलअंदाजी से भी नहीं चूक रही हैं। यह इस देश के राजनीति के लिए उचित नहीं है। राजनीति में बयानबाजी का एक दायरा बनाना बहुत ही जरूरी है। इसे नजरअंदाज करना देश के आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।


सियासत के दांव-पेंच में पार्टियां ये भूल गई हैं कि राजनीतिक मुद्दों की क्या अहमियत है। हालांकि ये हाल एक अनपढ़ व्यक्ति की नहीं है। पढ़े- लिखे लोगों के गंदे बयान से लोगों को शर्मशार होना पड़ रहा है। नेताओं को पार्टी हितों की ही सिर्फ फिक्र है। समाज और देश हित में कोई बयान देना उन्हें शायद अच्छा नहीं लग रहा है।


अगर भारत में दो पार्टियों के चुनावी ऐजेंडा पर गौर किया जाए तो शायद किसी का एजेंड़ा ऐसा नहीं होता जिससे देश के गरीबों को फायदा हो। वो सिर्फ धर्म और संप्रदाय को ध्यान में रखते हुए बनाए जा रहे हैं। अगर भाजपा हिंदुत्व को मुद्दा बनाती है तो वहीं कांग्रेस अपने को सेक्यूलर पार्टी के रूप में साबित करना चाहती है। ये बहुत हीं सोचने वाला विषय है कि आखिर भारत जैसे विकासशील देश में सबसे अधिक किस मुद्दे की जरूरत है। आखिर धर्म और संप्रदाय से देश में निवास कर रहे गरीबों का इससे कोई भला नहीं होने वाला है। अगर देश के लोगों को जाति, धर्म और संप्रदाय के आधार पर बांट दिया जाए तो क्या इससे देश का विकास संभव है ? कतई नहीं।

भारत युवाओं का देश माना जाता है। अगर इस तरह की राजनीति होती रही तो देश में कई तरह के बवाल खड़े होंगे, जो देश के लिए घातक परिणाम पैदा कर सकते हैं। जो सही मुद्दे हैं उन पर ध्यान देने की जरूरत है न कि बेकार के मुद्दे जिनसे देश गर्त की ओर जा सकता है। राजनीतिक पार्टियों को सही मुद्दों को रखकर चुनाव लड़ने की जरूरत है।

#Indian political system#hate politics#BJP#Congress#leader#religion#develping country






Saturday, October 25, 2014

आप विकास की कोशिश भी करेंगे तो विरोध झेलना तो पड़ेगा ही !!!!!!

विकास और विरोध एक दूसरे से समानता तो रखते हीं हैं, अगर आप विकास करते हैं या उसके प्रति कोई कदम उठाते हैं तो इसका विरोध तो होगा हीं। विरोध तो कुछ लोगों का मूल अधिकार है और न तो वो विकास में अपना योगदान देना चाहते हैं और न हीं उनके पास समाज को देने के लिए कुछ है। विरोध आसान है, पर उसको सहते हुए अनवरत आगे बढ़ते रहना मुश्किल कार्य है। इसपर मुझे एक वाकया याद आ रहा है।


आज से लगभग 7-8 साल पहले की बात है। एक गांव में पांचवीं क्लास तक के बच्चे पेड़ के छांव के नीचे पढ़ते थे। गांव के ही दो तीन लोगों ने सोचा क्यों न हम इन छात्रों के लिए स्थायी क्लासरूम की व्यवस्था कर दी जाए। उन्होंने काफी कोशिश कर सरकारी जमीन को स्कूल के नाम करा दिया। वह जमीन दो- तीन लोगों को कब्जे में थी, जिसमें वो अपनी गाय और भैंस बांधते थे। हालांकि उनको परेशानियां तो बहुत हुई। उन्होंने जमीन छोड़ने से मना कर दिया। उनके लिए मुश्किल था क्योंकि उनके गाय-भैंस कहां बांधे जाते, लेकिन दूसरी तरफ उन बच्चों के लिए स्कूल नहीं बनना परेशानियों से भरा था, बच्चे बारिश में हमेशा भींग जाते और छूपने के लिए मंदिरों और पेड़ों की छांव की जरुरत पड़ती। पढ़ाई भी बाधित होती और जिस  दिन बारिश होती उनकी छुट्टी हो जाती। उनके चेहरे तो जरूर खिल उठते पर कौन उठाए परेशानी स्कूल बनवाने की। किसको पड़ी थी किसी से दुश्मनी लेने की।


स्कूल बनाते समय प्रशासन का सहारा लेना पड़ा। आए दिन रोज विवाद के बावजूद स्कूल बन ही गया। जब स्कूल की छत तैयार हो गया। स्थानीय लोगों ने सपोर्ट में लगी लकड़ी हटा दी ताकि स्कूल गिर जाए पर जब बनाने वालो ने तुरंत निरीक्षण किया पता चला कि सपोर्ट हटा दिए गए हैं। आनन-फानन में सपोर्ट लगाया गया। एक बड़ा हादसा टल गया।


आज स्कूल बन गया और विरोध करने वाले लोग प्रत्येक कार्य करने लगे। स्कूल उनके घर जैसा बन गया है। आए दिन किसी बारात ठहरता तो कोई धान और गेहूं सूखाता है। बच्चे को भी आराम हो गया। वो विरोधी आज भी स्कूल बनवाने से खफा हैं।तो क्या विरोध करने से विकास छोड़ दिया जाए नहीं आप अपना सामाजिक कार्य और विकास कार्यों को जारी रखें।

#development#school#adversary#people#opposed#construction#

  


   

Thursday, June 26, 2014

आखिर किस हाशिये पर खड़ी है राजनीति ?

बयानबाजी को दौर इस कदर जारी है मानो पार्टियों के नेता महाभारत के युद्ध की तरह तीरों की बरसात कर  रहे हों, नेतागणों के जुबान फिसलते जा रहे हैं। बातों के इस युद्ध में इन बातों का ख्याल बिल्कुल भूल जा रहे हैं कि इससे लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचेगा कि नहीं।


 देश को जाति,धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, लिंग के आधार पर बांटकर कब तक वोटों को हासिल करने की राजनीति की जाती रहेगी। यह नफरत एक दूसरे के प्रति क्यों पैदा की जा रही है। अगर वोट बैंक बनाने के खातिर देश के आस्तित्व पर खतरा मंड़राने लगे तो यह हमारे जैसे लोकतंत्र के लिए यह कहां तक न्यायोचित है, देश की जनता जागरुक हो चुकी है, उसे निर्णय लेने आता है। 

कुछ ऐसे अटपटे बयानों से देश में जैसे भूचाल सा आ गया लोग सिर्फ टकटकी भरी निगाहों से समाचार देखते नजर आ रहें मानों हमारे जनप्रतिनिधियों को क्या हो गया है वे इतने उलझे हुए बयान क्यों दे रहे हैं,क्या यह सिर्फ व सिर्फ वोट के लिए है तो यह बेहद हीं कठिन समय है जब भारतीय लोकतंत्र को ये भी है दिन देखने पड़ रहे हैं।

hate speech by leaders#emotions#people#indian democracy

Friday, September 13, 2013

मेरी जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है

 वह पीपल का पेड़ !!!                     


अपनी जिंदगी भी उस पीपल की पेड़ की तरह दिखता है जो बाहर से तो हरा-भरा नजर आता है लेकिन अंदर से खोखला हो चला है ।मुझे याद है जब मैं छोटा था तो गांव के स्कूल में एक पीपल का पेड़ हुआ करता था जहां मैं पढ़ता था ।उस समय वह हरा-भरा हुआ करता था उसके छांव के नीचे मास्टर साहब पढ़ाया करते थे लेकिन दिन ढ़लने के साथ उसके स्थान में परिवर्त्तन होता रहता ।बारिश में छुपनें के लिए दूसरे क्लास में जाना पड़ता था।

सावन में तो उसके टहनियों पर झुले लगे होते थे लेकिन उसके खोखले होनें का राज कोई नहीं जानता था।वह वृक्ष बहुत दिनों तक लोगों को झेलता रहा पर किसी को अपना राज नहीं बताया और लोगों को छांव प्रदान करता रहा । पर्वों मे उसकी पूजा-अर्चना से वह बहुत खुश था कोई उसमे धागा बांधता तो कोई वहां अगरबत्तियां जलाता ।

मानो तो देव नहीं तो पत्थर वाली कहावत यहां भी चरितार्थ होती है ।आखिर अंत में उसे अपना राज खोलना हीं पड़ा पर वह क्या करता लोगों से तंग आकर यह बताना हीं पड़ा ।वह हार चुका था उसकी एक बड़ी सी टहनीं लोगों के झुले का शुकार बन गयी । अगरबत्तियों के कारण उसमें आग लग गयी और उसका एक भाग खोखला नजर आने लगा और सबको पता चल गया कि वह खोखला था।समय ने करवट ली और आंधियों ने उसे गिरा दिया क्योंकि उसका तना कमजोर था ,उसका नींव हीं खोखला था पर क्या करता वह अनवरत सेवा करता रहा,किसी को नहीं पता था वह कमजोर है पर उसकी दृढ़ शक्ति का परिणाम था कि वह खड़ा रहा ।

आज वहां समतल मैदान के सिव कुछ भी नहीं उसकी नामोनिशान तक मिट गया अब वहां न तो छांव है और न हीं पूजा स्थल ।जिस पेड़ ने कभी लोगों को छांव प्रदान किया वहां अब कुछ भी नहीं लोगों ने नया पेड़ ढ़ूंढ़ लिया और वो भी उनकी सेवा करता रहेगा ।अजीब बात है अपनी जिंदगी की कुछ पहलु की समानता उस पेड़ से हो ही सकती है । है न !

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Monday, August 5, 2013

रिश्तों में धोखा और दरकते रिस्तों की हकीकत...

कुछ रिश्तों को  जिंदगी भर निभाने का वादा और कसम दिलाकर साथ-साथ जिंदगी में अच्छा संबंध बरकरार रखनें का सिलसिला आज समाप्त होता जा रहा है। रिश्तों को देखकर तो ऐसा लगता है मानो कोई प्यार करने वाला फरिस्ता आसमां से आ टपका हो पर ये कितना सच्चा है ये तो वक्त ही बताता है ।

 संबंधों में शहद सा मिठास एक दिन फीका पड़ जाता है भला ये कौन जानता है । एकतरफा संबंध भला कैसे जिंदगी भर साथ रहता है ।अच्छे संबंधों की चाहत न जानें क्यों अंधेरे की ओर रूख कर हीं जाती है अगला ब्यक्ति यह नहीं समझ पाता की कोई उसके लिए कितना खास बस उसे जिंदगी भर के लिए जख्म दे ही जाता है ,हो सकता है वो समझ नहीं पाए पर समय किसी के अहम होंने का अहसास जरूर दिलाती है । किसी के द्वारा झूठे अपनापन ,धोखा दर्द देते हैं जो दिल के एक कोने में सिसकता रहता है उसके पास यही सवाल होते हैं क्या किसी को धोखा देने के लिए मैं हीं था ?


क्या रिश्ते मनोरंजन का साधन बन गये हैं जो मन बहलाए और किसी का फायदा निकल जाए तो बस उसकी जिंदगी से बाहर निकल जाए ।झूठे संबंध जिंदगी में धीमे जहर का काम करते है ,लोगों को अवसाद ग्रसित करते हैं । रिश्ते  सच्चाई से   निभाये जाएं तो जिंदगी जन्नत से कम नहीं ।

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Tuesday, January 8, 2013

यादों के साये में जिंदगी का धुंधलापन

यादें हीं याद आती हैं !!!!!!!!!!


कहते हैं यादें जिंदगी  के अहम् हिस्सों में से एक है पर कभी- कभी यादें गहरे जख्म को ताजा कर देती हैं .ये सही  भी है ।वक्त कब किस ओर और कहाँ ले जाएगा ये कौन जानता है ? हर कोई अच्छी जिंदगी के बारे में हीं सोचता है पर भला वक्त और यादों पर किसका वश होता है ।यादें हंसाती हैं भी हैं और रुलाती भी।यादें सपनें की तरह होते हैं जो कई पहलुओं को पल भर में छू जाते हैं ।


आजकल मेरे मन में दुविधाओं का सैलाब उमड़ पड़ा है । एक अजीब सा बदलाव महसूस कर रहा हूँ । शायद अकेलेपन की आदत पड़ती जा रही है । कितना अंतर हो गया है पहले और आज में । मैं परिस्थतियों को संभालने की कोशिश कर रहा हूँ। मेरी इन परिस्थितयों से बहुत लोग नाराज होंगे पर क्या करुँ  किससे बताऊँ समझ में नही आता पर समझेगा कौन अपनी परेशानियों को बतानें से क्या फायदा ये सभी प्रश्न मन को विचलित करते हैं। मैं कुछ यादों से उबरना चाहता हूँ जो अच्छी भी हैं बूरी भी। हर परेशानियों को अपने से उबरना पड़ता है हाँ सही भी है कुछ लोग इसे पागलपन भी कह सकते हैं पर अपनी मन: स्थिति को किसी ब्यक्ति से ज्यादा कौन जान सकता है यूँ तो बदलाव के कई कारण भी हो सकते हैं। मैं चाह कर भी कई पलों को नहीं भूल नहीं सकता फिर भी कोशिश करनें में भला क्या हर्ज है ।जिंदगी में कई ऐसे मौके आए जिनके तरफ हम बरबस हीं खींचे चले जाते हैं ।समझ में नहीं आता यादों में जिंदगी है या जिंदगी में यादें !