विकास
और विरोध एक दूसरे से समानता तो रखते हीं हैं, अगर आप विकास करते हैं या उसके
प्रति कोई कदम उठाते हैं तो इसका विरोध तो होगा हीं। विरोध तो कुछ लोगों का मूल
अधिकार है और न तो वो विकास में अपना योगदान देना चाहते हैं और न हीं उनके पास समाज
को देने के लिए कुछ है। विरोध आसान है, पर उसको सहते हुए अनवरत आगे बढ़ते रहना
मुश्किल कार्य है। इसपर मुझे एक वाकया याद आ रहा है।
आज
से लगभग 7-8 साल पहले की बात है। एक गांव में पांचवीं क्लास तक के बच्चे पेड़ के
छांव के नीचे पढ़ते थे। गांव के ही दो तीन लोगों ने सोचा क्यों न हम इन छात्रों के
लिए स्थायी क्लासरूम की व्यवस्था कर दी जाए। उन्होंने काफी कोशिश कर सरकारी जमीन
को स्कूल के नाम करा दिया। वह जमीन दो- तीन लोगों को कब्जे में थी, जिसमें वो अपनी
गाय और भैंस बांधते थे। हालांकि उनको परेशानियां तो बहुत हुई। उन्होंने जमीन
छोड़ने से मना कर दिया। उनके लिए मुश्किल था क्योंकि उनके गाय-भैंस कहां बांधे
जाते, लेकिन दूसरी तरफ उन बच्चों के लिए स्कूल नहीं बनना परेशानियों से भरा था,
बच्चे बारिश में हमेशा भींग जाते और छूपने के लिए मंदिरों और पेड़ों की छांव की
जरुरत पड़ती। पढ़ाई भी बाधित होती और जिस दिन बारिश होती उनकी छुट्टी हो जाती। उनके चेहरे
तो जरूर खिल उठते पर कौन उठाए परेशानी स्कूल बनवाने की। किसको पड़ी थी किसी से
दुश्मनी लेने की।
स्कूल
बनाते समय प्रशासन का सहारा लेना पड़ा। आए दिन रोज विवाद के बावजूद स्कूल बन ही
गया। जब स्कूल की छत तैयार हो गया। स्थानीय लोगों ने सपोर्ट में लगी लकड़ी हटा दी
ताकि स्कूल गिर जाए पर जब बनाने वालो ने तुरंत निरीक्षण किया पता चला कि सपोर्ट
हटा दिए गए हैं। आनन-फानन में सपोर्ट लगाया गया। एक बड़ा हादसा टल गया।
आज
स्कूल बन गया और विरोध करने वाले लोग प्रत्येक कार्य करने लगे। स्कूल उनके घर जैसा
बन गया है। आए दिन किसी बारात
ठहरता तो कोई धान और गेहूं सूखाता है। बच्चे को भी आराम हो गया। वो विरोधी आज भी
स्कूल बनवाने से खफा हैं।तो
क्या विरोध करने से विकास छोड़ दिया जाए नहीं आप अपना सामाजिक कार्य और विकास
कार्यों को जारी रखें।
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