" जिंदगी रैन -बसेरे के सिवा कुछ भी नहीं ये नफश - उम्र के फेरे के सिवा कुछ भी नहीं
दिल कभी शहरे सदरंग हुआ करता था अब तो उजड़े हुआ डेरे के सिवा कुछ भी नहीं "
पाकिस्तानी शायर शेर अफजल जाफरी की ये पंक्तियाँ उन तमाम गरीबों के दर्द को बयां कर रही है जो बंजारों का जीवन जीने को विवश है .ये अपना गुजर -बसर फुटपाथों के किनारे करते है ,चाहे गर्मी का मौसम हो या ठण्ड का इसकी परवाह इन्हें नहीं है ये जिंदगी जिए जा रहे है .... सड़क के किनारे इनके आशियाँ होने के कारण कभी- कभी दुर्घटनाओं का शिकार होना पड़ता है लेकिन क्या कर सकते हैं ये गरीब .सरकार द्वारा कई वायदे किए जाते है इनकी दुर्दशा सुधारने के लिए फिर भी वायदों का क्या नेता इसे हमेशा की तरह भूल जाते हैं.....जहाँ एक ओर शहरों में सफाई और स्वछता की बात की जाती है और अतिक्रमण हटाये जा रहे हैं , लेकिन ये नहीं
सोचा जाता की इन गरीबों का क्या होगा.हालाँकि इनके लिए कई योजनाएं बनाई जाती है पर इनपर अमल कम ही होता है।
सोचा जाता की इन गरीबों का क्या होगा.हालाँकि इनके लिए कई योजनाएं बनाई जाती है पर इनपर अमल कम ही होता है।
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