Monday, December 10, 2012

अपनापन का दर्द !!!!

अजीब कशमकश सी है आज दिल में ! पता नहीं मेरी बेचैनी कुछ ज्यादा ही बढ़ती जा रही है मैं  उलझनों में जी रहा हूँ मुझे भी पता नहीं आखिर क्यों मैं इतना उदास हूँ  ?   इस उदासी और बेचैनी के वजह कहीं मेरे अपनें तो नहीं ।

कहते हैं कि हमें अपनें हीं दर्द देते हैं ,हम अपनों से हीं हार जाते हैं अपनापन का मतलब सिर्फ खुन के रिस्ते से हीं नहीं बल्कि जिसे हम दिल से चाहते हैं और हमेशा अपना मानते हैं आखिर वो भी तो अपना हीं है ।लेकिन सही तौर पर देखा जाए तो ये कहना बेहद मुश्किल है कि अपना है कौन ?



यह कहना बेहद आसान सा लगता है तुम मेरे सच्चे दोस्त हो और जिंदगी भर दोस्ती निभानें का वादा भी कर लिया जाता है । अगर किसी से नजदिकियां बनाओ तो वो दूरी बनाना चाहता है लेकिन इस ब्यावसायिक युग में आपका अपना भला कौन हो सकता है ! अगर आपको उससे फायदा नहीं तो वो आपसे दोस्ती क्यों करेगा ? सही मायनों में अपना वहीं है जो आपके भावनाओं दुख-दर्द को महसुस कर सके। जब आप परेशान हो तो आपकी परेशानियों को समझे ।ऐसा मिलना संभव नहीं होता  । जल्दबाजी में हम किसी को अपनें दिल की बातें बता देते है बाद में वहीं ब्यक्ति हमारी भावनाओं को ठेस पहुँचानें में कोई कसर नहीं छोड़ता ।क्या सिर्फ अपना कहना ही दोस्ती की सच्ची निशानी है, दोस्ती और अपनापन के कोई अपने फर्ज भी होते है जिसे निभाने की जरुरत होती है । हम जिसे भी अपना समझते हैं उससे कुछ ज्यादा हीं उम्मीदें लगा बैठते हैं और सबसे अधिक ठेस वहीं पहुँचाते हैं ।
  
मैंने बहुत लोगों को अपना बनाने की कोशिश भी की सब ने दिखावापन के सिवा कुछ नहीं दिया । मेरी भी गलती होती है उन्हे बहुत जल्द अपना बना लेता हुँ । किस तरह के लोग होते हैं मुझे ये नहीं पता पर शायद इनके लिए आसान होता है रिस्तों को तोड़ना । कभी न कभी उन्हें एहसास होगा अपनापन का दर्द ।  
 

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